बलिदान दिवस विशेष: बहुत लोगों को ये पता नहीं है कि आज अगर पश्चिम बंगाल भारत का अंग है तो इसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ मुखर्जी को है

   आज का सम्पादकीय।लखनऊ, अरुण कुमार सिंह।


     मुझे लगता है कि इस देश की युवा पीढ़ी को मुखर्जी के योगदान और बलिदान के बारे में पता होना चाहिए… उन्हे ये पता होना चाहिए कि आज अगर पश्चिम बंगाल भारत का अंग है तो इसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ मुखर्जी को है… श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं होते तो पूरा पश्चिम बंगाल पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में मिला दिया जाता… आज़ादी से ठीक पहले मुस्लिम लीग की सुहारवर्दी (वही डायरेक्ट एक्शन डे वाला हैवान) सरकार ने पूरे बंगाल को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने की तैयारी कर ली थी… लेकिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल को विभाजित करने का आंदोलन छेड़ा, जिसका कांग्रेस ने विरोध किया… तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरू को जवाब देते हुए बयान दिया कि – “जब बंगाल के 45 फिसदी हिंदुओं को मुस्लिम लीग का गुलाम बनाने की तैयारी हो रही है तो ये हमारा फर्ज है कि हम अपने लिए एक ऐसे भूखंड की मांग करें जहां हम स्वाभिमान के साथ जी सकें… हम पर आरोप लगाने वालों से मैं पूछना चाहता हूं कि क्या कांग्रेस ने खुद मुस्लिम लीग को खुश करने के लिए बंबई और सिंध का विभाजन स्वीकार नहीं किया?”


  बहुत लोगों को ये पता नहीं है कि अगर श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं होते तो इस देश में गांधी की खादी को विदेशी टेरिकॉट कब का हज़म कर गया होता।


  नेहरूवादी और वामपंथी इतिहासकारों ने देश के कुछ महान नेताओं के बारे में इस कदर कुप्रचार किया है कि हमारी नई पीढ़ी ने उनके झूठ को ही सच मान लिया है… कल ये साजिश तब फिर सामने आई जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस (जी हां, बलिदान दिवस… कश्मीर को इस देश का पूर्ण अंग बनाने के लिए उन्होने अपने प्राणों की आहुति दी थी) पर कुछ सिकलुर विद्वानों ने फेसबुक से लेकर ट्विटर पर ये कुप्रचार किया कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आज़ादी से पहले 1941 में जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ बंगाल में सरकार बनाई थी…


ये जानकारी बिल्कुल गलत है… दरअसल 1937 में एकीकृत बंगाल में कृषक प्रजा पार्टी की सरकार बनी थी जिसके नेता फजलुल हक थे… उनकी सरकार को मुस्लिम लीग ने समर्थन दिया था… 1941 में वायसराय डिफेंस काउंसिल के मुद्दे पर जिन्ना की मुस्लिम लीग ने कृषक प्रजा पार्टी से समर्थन वापस ले लिया और फजलुल हक की सरकार गिर गई… फिर 1941 में कृषक प्रजा पार्टी और उनके नेता फजलुल हक को बाकी दलों ने समर्थन दिया और उनकी सरकार फिर से बनवा दी… इन दलों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हिंदू महासभा भी थी और सुभाष चंद्र बोस की फॉरवर्ड ब्लॉक भी थी… इसी दौरान हिंदू महासभा की तरफ से श्यामा प्रसाद मुखर्जी कृषक प्रजा पार्टी की सरकार में वित्त मंत्री बने… ना कि मुस्लिम लीग की सरकार में… और 1942 में उन्होने इस पद से इसलिए इस्तीफा दे दिया था क्योंकि तब मिदनापुर में आए भयंकर तूफान में ब्रिटिश सरकार ने पीड़ितों की मदद नहीं की थी।


और हां… जो आज देश के लोग बिना परमिट के जम्मू-कश्मीर में जा पा रहे हैं तो इसके पीछे सिर्फ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान है…


बहुत लोगों को ये पता नहीं है कि अगर श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं होते तो इस देश में गांधी की खादी को विदेशी टेरिकॉट कब का हज़म कर गया होता … मुखर्जी देश के पहले उद्योग मंत्री थे और उन्होने अपने तीन साल के छोटे से कार्यकाल में बापू के सपनों को पूरा करने का काम किया… जब प्रधानमंत्री नेहरू और बाकी मंत्री गांधीवाद से भटक रहे थे (ऐसा खुद गांधी जी ने भी कहा था)… तब बतौर उद्योग मंत्री मुखर्जी इस देश में खादी ग्रामोद्योग, ऑल इंडिया हैंडीक्राफ्ट बोर्ड और ऑल इंडिया हैंडलूम बोर्ड की नींव रख कर गांधी को सच्ची श्रद्धांजली दे रहे थे… इतना ही नहीं, मुखर्जी के उद्योग मंत्री रहते हुए देश का पहला रेल इंजन कारखाना चितरंजन में बना, वहीं विशाखापट्टनम में जहाज बनाने का कारखाना स्थापित हुआ… मुखर्जी ने ही भिलाई प्लांट, सिंदरी फर्टिलाइजर समेत कई बड़े-बड़े कारखानों का ब्लू प्रिंट तैयार करवाया था… जिन्हे बाद में चाचा नेहरू ने भारत का असली मंदिर कहा था।


 


   इस देश के हर बाशिंदे को इंदिरा गांधी का “मेरे खून की आखिरी बूंद” वाला भाषण रटा दिया गया है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि 1953 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भी अपने बलिदान का पहले से ही ऐलान कर दिया था… उन्होने जम्मू में अपनी आखिरी रैली में कहा था – “या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य को पूरा करने के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूंगा”… और इस महान नेता ने अपने देश के लोगों से जो वादा किया था वो करके भी दिखा दिया… इस महान नेता केे बलिदान को शत-शत नमन है।