राष्ट्रीय एकता दिवस: जानिए महिला सशक्तिकरण पर पटेल का क्या नजरिया था...

राष्ट्रीय एकता दिवस: जानिए महिला सशक्तिकरण पर पटेल का क्या नजरिया था...


सरदार पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) महिला सशक्तिकरण (women empowerment) के हिमायती थे। वो अपने भाषणों से महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया करते थे...



आज लौहपुरुष (Iron Man) सरदार वल्लभभाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) की जन्म जयंती (birth anniversary) है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेताओं में से एक सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात (Gujrat) के नांदेड़ में हुआ था। एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले सरदार पटेल गांधीजी से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूदे थे। सरदार पटेल आजादी के बाद भारत के पहले उप प्रधानमंत्री बने। आजादी के तुरंत बाद वो देश को एकजुट रखने में अपने कुशल नेतृत्व के लिए जाने गए।


    सरदार पटेल के व्यक्तित्व पर काफी कुछ लिखा गया है। सरदार पटेल महिला सशक्तिकरण के हिमायती थे। वो स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका को बखूबी समझते थे। बारदोली के सत्याग्रह में उन्होंने महिलाओं को झकझोरने वाला भाषण दिया था। वो चाहते थे कि इस सत्याग्रह में ज्यादा से ज्यादा महिलाएं शामिल हों। बारदोली सत्याग्रह 1928 में हुआ गुजरात का किसान आंदोलन था। सरदार पटेल इस किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे।


    उस समय ब्रिटिश सरकार के अधीन प्रांतीय सरकार ने किसानों के लगान में तीस फीसदी की वृद्धि कर दी थी। पटेल इस लगान वृद्धि का विरोध कर रहे थे। बारदोली सत्याग्रह के दौरान पटेल ने महिलाओं को प्रेरित करने वाले भाषण दिए। अपने भाषण में पटेल ने कहा था, 'बहनों, मैं तुम्हारे पैरों और हाथों में गुलामी की निशानियां नहीं देखना चाहता। ये जो तुम पीतल के भारी गहने पहनती हो वो बेकार है। ये बहुत गंदगी जमा करते हैं। इससे त्वचा वाली बीमारियां होती हैं।


    मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि इससे तुम जल्दी छुटकारा पा जाओ।' उस वक्त पटेल के इस भाषण का महिलाओं पर गहरा असर पड़ा थ। बारदोली सत्याग्रह में गुजरात की महिलाओं ने भरपूर भागीदारी निभाई। बारदोली सत्याग्रह के कुशल नेतृत्व और इसके बाद ब्रिटिश सरकार के किसानों की मांग मान लिए जाने के बाद गुजरात की महिलाओं ने वल्लभभाई पटेल को सरदार की उपाधि दी।


    इसके बाद वल्लभभाई पटेल सरदार पटेल के नाम से मशहूर हुए। पटेल महिलाओं के पर्दा प्रथा के भी खिलाफ थे। बिहार में महिलाओं को पर्दे के पीछे रखने के वो घोर आलोचक थे। एक बार अपने भाषण में इसकी मुखालफत करते हुए, उन्होंने कहा था- तुम्हें शर्म नहीं आती, तुम अपनी औरतों को पर्दे में रखते हो? ये महिलाएं कौन हैं? तुम्हारी माताएं, बहनें और पत्नी, क्या तुम्हें लगता है कि पर्दे में रखकर ही तुम अपनी औरतों की पवित्रता का ख्याल रख सकते हो? अगर मैं कह सकता तो तुम्हारी औरतों से कहता कि ऐसे कायर पति के साथ रहने से ज्यादा अच्छा है तुम तलाक ले लो।


   पटेल चाहते थे कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भागीदारी बढ़े। इसमें महिलाओं की पर्दा प्रथा आड़े आ रही थी। महिलाएं घर से निकलने में सकुचाती थी। पटेल उनके भीतर से शर्म और डर को निकालना चाहते थे। वो चाहते थे कि पुरुषों की तरह महिलाएं भी बराबरी में आकर स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लें।


    एक बार महिलाओं को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा था- 'अब आंदोलन अपने चरम पर पहुंच चुका है। इसलिए औरतों को अपने मर्दों के भरोसे बैठने से काम नहीं चलेगा। औरतों को विरोध करना चाहिए। औरतें पुरुषों को कुछ उसी तरह से देखती हैं जैसे भारत के लोग सरकार और पुलिस की तरफ देखते हैं। लेकिन इससे तुम्हारी रक्षा नहीं होगी।' पटेल समाज में महिलाओं की अहमियत को समझते थे। वो हमेशा महिलाओं को कुछ नया और समाज के भीतर अपनी भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रेरित करते थे।


   पटेल महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ थे। आजादी के पहले म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनाव में महिलाएं उम्मीदवार नहीं हो सकती थीं। उनके चुनाव लड़ने पर पाबंदी थी। सरदार पटेल ने अहमदाबाद म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन में रहते हुए पहली बार महिलाओं के चुनाव लड़ने को मंजूरी दिलवाई।


     अहमदाबाद जिला म्यूनिसिपल एक्ट के सेक्शन 15(1)(सी) में ये प्रावधान था कि महिलाएं कॉरपोरेशन का चुनाव नहीं लड़ सकतीं। 13 फरवरी 1913 को एक प्रस्ताव पारित कर महिलाओं को चुनाव लड़ने से रोका गया था। सरदार पटेल का कहना था कि महिलाओं को चुनाव से दूर रखकर आधी आबादी के साथ नाइंसाफी की जा रही है। सरदार पटेल की वजह से सेक्शन 15 (1)(सी) को खत्म कर दिया गया।