बिहार के विभूति भारत का गौरव आइंस्टाइन के सिद्धांत को चुनौती देने वाले महान गणितज्ञ डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन

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बिहार के विभूति भारत का गौरव आइंस्टाइन के सिद्धांत को चुनौती देने वाले महान गणितज्ञ डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह गोलोकवासी हो गए। सूचना मिली कि उनका निधन हो गया वे अपने परिजनों के संग पटना के कुल्हरिया कंपलेक्स में रहते थे।


   बृहस्पतिवार सुबह उनके मुंह से खून निकलने लगा, परिजन पीएमसीएच लेकर गए जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। एक पखवाड़े पूर्व बीमार पड़े थे तब पीएमसीएच में नेताओं का ताता लगा था। बिहार के मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री तक उन्हें देखने गए थे। प्रकाश झा ने फिल्म बनाने की घोषणा कर रखी थी।


    आरा के बसंतपुर के रहने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह बचपन से ही होनहार थे, खुदा ने कुछ खास तरह के ज़ेहन से नवाजा था, सबके बारे में नहीं कह सकती, लेकिन हां ज्यादातर लोगों के लिए मैथ मतलब ''हमसे ना हो पाएगा'' वाली चीज़ समझी जाती है, लेकिन जिनको मैथ से प्यार हो जाता है, वो तो चलते फिरते आंखों के सामने इनविज़बल एक बोर्ड लगाए रहते हैं और उसी पर सवालों को हल करते रहते हैं।


    जैसे-जैसे मैं इस शख्स के बारे में जानकारी हासिल कर रही थी आंखों के सामने महान गणितज्ञ जॉन नैश की कहानी आ रही थी जिसे बहुत ही खूबसूरती के साथ रशेल क्रो ने ''ए ब्यूटिफूल मांइड'' फिल्म में पेश कर ऑस्कर जीता। दोनों के ही जीवन में बहुत सी समानताएं हैं, लेकिन बावजूद बहुत से अंतर भी हैं। डॉ वशिष्ठ बचपन से ही बहुत होनहार रहे उनके बारे में जिसने भी जाना हैरत में पड़ गया। छठी क्लास में नेतरहाट के एक स्कूल में कदम रखा, तो फिर पलट कर नहीं देखा एक गरीब घर का लड़का हर क्लास में कामयाबी की नई इबारत लिख रहा था।


   वे पटना साइंस कॉलेज में पढ़ रहे थे कि तभी किस्मत चमकी और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन कैली की नजर उन पर पड़ी जिसके बाद वशिष्ठ नारायण 1965 में अमेरिका चले गए और वहीं से 1969 में उन्होंने पीएचडी की। वशिष्ठ नारायण ने 'साइकिल वेक्टर स्पेस थ्योरी पर शोध किया जिसके बारे में मैंने मैथ से जुड़े लोगों से बात की, लेकिन ईमानदारी से बता रही हूं कि कुछ पल्ले नहीं पड़ा, लेकिन उन लोगों के मुताबिक शोध बहुत ही शानदार है। यकीनन वक्त वशिष्ठ नारायण के साथ था कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले में एसिसटेंड प्रोफेसर की नौकरी मिली।


   उन्‍हें नासा में भी काम करने का मौका मिला, यहां भी वशिष्ठ नारायण की काबिलयत ने लोगों को हैरान कर दिया। बताया जाता है कि अपोलो की लॉन्चिंग के वक्त अचानक कम्यूपटर्स से काम करना बंद कर दिया, तो वशिष्ठ नारायण ने कैलकुलेशन शुरू कर दिया, जिसे बाद में सही माना गया। बहरहाल, जैसा की अक्सर होता है लोग विदेश जाते हैं तो वहीं के होकर रह जाते हैं, लेकिन वशिष्ठ नारायण पिता के फरमाबरदार बेटे थे।


   पिता के कहने पर विदेश छोड़कर देश लौट आए पिता के ही कहने पर शादी भी कर ली, लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था 1973-74 में उनकी तबीयत बिगड़ी और पता चला की उन्हें सिज़ोफ्रेनिया है, जिस पत्नी ने सात जन्म साथ निभाने की क़सम खाई। देश की अमूल्य निधि के गोलोकवासी होने का बेहद दुःख है। आपकी पुण्य स्मृति को नमन.