हिंदी के विकास में विदेशी योगदान-आर पी सिंह

 

 बेल्जियम  निवासी कामिक बुल्के इंजीनियरिंग के विद्यार्थी थे।उन्होंने युवाकाल में संयासी बनने का फैसला किया और भारत आ गये। वह राँची आकर एक स्कूल में पढ़ाने लगे।उन्होंने हिंदी, संस्कृत, ब्रज व अवधी  भी सीखी।वह सेंट जेवियर कॉलेज राँची में हिंदी व संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे। उन्होंने 40000 शब्दों का अंग्रेजी हिंदी शब्दकोश बनाया। बाद में वह चर्च के पुजारी हो गए और उनके नाम के आगे फादर लिखा जाने लगा।

 

आयरलैंड  के डॉ जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने हिंदी, संस्कृत व बांग्ल भाषा का अध्ययन किया।उन्होंने भाषाओं का एक परिवार ' लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' ,की रचना की। भारत सरकार उनके नाम पर ' डॉ जार्ज गियर्सन पुरस्कार' देती है।यह पुरस्कार गैर भारतीयों को हिंदी में योगदान के लिए दिया जाता है।

 

न्यूजीलैंड के रोनाल्ड स्टुअर्ट मैकग्रेगर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर रहे।वह चोटी के भाषा विज्ञानी थे।उन्होंने हिंदी अंग्रेजी शब्दकोश तैयार किया।

 

 हंगरी के इमरो बंड्या ने बुडापेस्ट में हिंदी पढ़ा और शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय से हिंदी में शोध किया।

 

रूस के पीटर वर्ननिकोव ने रामचरितमानस का रूसी भाषा में अनुवाद किया जो बहुत चर्चित हुआ।

 

चेक गणराज्य के डॉ च्देंनयेक वागनेर प्राग साइंस एकेडमी में  भौतिक रसायन शास्त्र वैज्ञानिक रहे। उन्होंने हिंदी में  लेखन किया। उनके अनुसार देवनागरी लिपि विश्व की सबसे वैज्ञानिक लिपि है। हिंदी में जो लिखा जाता है, वही पढ़ा जाता है। उन्होंने  बच्चों के लिए हिंदी में परीकथा' ड्रैगन के सात दिल' लिखा।

उन्होंने विज्ञान उपन्यास ' गुणसूत्र46' लिखा।

 

जापान के आकियो हागा ने 9 वीं शताब्दी में लिखी गई जापानी कहानी ' ताकेतोरी मोनो गा तारी' (बांस काटने वाले की कहानी)का हिंदी में अनुवाद किया।

 

जापान में हिंदी किसी दबाव नहीं पढ़ायी जाती। प्रो कोगा कात्तसुरो ओसका विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष थे।

उन्होंने हिंदी जापानी शब्दकोश तैयार किया।शब्दकोश 1439 पृष्ठो का था। इसके प्रकाशन के लिए प्रो कोगा ने अपना घर तक बेंच दिया।

जापान में 1908 से ही हिंदी पढ़ाई जाने लगी थी। वहाँ अब जापानी मूल के लोग ही  हिंदी पढ़ाते हैं।

 

चीन के पेचिंग विश्विद्यालय में भी 1992 से हिंदी पढ़ाई जाने लगी है। 

 

भारत को बेहतर ढंग से जानने के लिए  दुनिया के 115 से ज्यादा देशों में हिंदी पढ़ायी जाने लगी है। अमेरिका के 32से ज्यादा शैक्षणिक संस्थानों में हिंदी पढ़ायी जाती है।

 

आज हिंदी विश्व की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है।

 

ऐसा नहीं है कि  लोग केवल धर्म व संस्कृति की वजह से हिंदी सीख रहे हैं - व्यापार एक बड़ी वजह है। दक्षिण कोरिया में लोग हिंदी सीख रहे हैं क्योंकि हुंडई, सैमसंग, एल जी आदि कम्पनियां भारत मे व्यापार कर रही हैं।

फेसबुक, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, ट्विटर आदि कम्पनियां व्यापक बाजार व मुनाफे को देखते हुए हिंदी प्रयोग को बढ़ावा दे रही हैं।

 

लेकिन यह व्यवहारिक सत्य है कि जब तक हिंदी रोजगार, व्यापार व सरकारी काम की भाषा नहीं बनेगी तब तक हिंदी दिवस मनाने से कोई लाभ नहीं होगा।

 

देखना यह है कि विदेशी तो हिंदी के लिए इतना काम कर रहे हैं, लेकिन हम कब करेंगे।

 

आर पी सिंह